डॉ विजय शंकर
जहाँ जाता हूँ,
निराश लौटता हूँ ।
आशा की ललचाई नज़र,
मंजर देख बंजर हो जाती है ।
सोचता था कि युवा परिवर्तन लाएँगे,
मगर बेमौसम उपज़, बेजान लगते हैं ।
सबका एक ही रोना, एक ही राग_रंग ढ़िठाई,
व्यवस्था को कोसना अब मज़बूरी बन गई ।
मर रही है आत्मा, मगर फूल-फल रहा है देह ,
कहाँ जा रहे हैं हम, वो मंज़िल नहीं है गेह।
सब जी रहे हैं, इसलिए जीये जा रहे हैं ।
अरमान बहुत मगर कर्म तासिर खो बैठे हैं,
कभी भाग्य, व्यवस्था, गैरों पर गरज बैठे हैं ।
लगे लगन जतन से, मंजर बदल सकता ,
खुद ही रहें पाक तो ओरों को राह दिखा सकते ।
त्रुटि कहाँ नहीं ! सुधार साबून रोज़ लगावें,
आज़ नहीं तो कल, तस्वीर अलग बनावें।
विपरित दशा में भी, श्रम का चप्पु चलायें ही ।
चाहते सभी मान-धन,आगे कोई बढ़ाये हाथ,
पिछे-पिछे आएँगे सब, जब देखेंग मंजिल साफ़ ।
श्रेष्ठ और ज्येष्ठ का करें दिल से सम्मान,
ज्ञान दीप के आभा-प्रभा से बने पहचान ।।
डॉ विजय शंकर
अटल लैंग्वेज लैब से

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