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देवघर सीओ पर सियासी स्नेह या प्रशासनिक हठधर्मिता? — विधायक सुरेश पासवान के ‘मोहजाल’ में उलझा सिस्टम, नारायण दास ने खोली पोल!

देवघर संवाददाता
देवघर में इन दिनों मौसम से ज़्यादा गर्म राजनीति और प्रशासन की हवा चल रही है। *केंद्र में हैं देवघर के सर्किल ऑफिसर (सीओ) अश्विनी कुमार*— जिन पर अब सवाल कम, सुरेश पासवान की सरपरस्ती ज्यादा दिख रही है। सवाल उठने लगा है कि यह प्रशासनिक स्नेह है या राजनीतिक संजीवनी?

मामला तब भड़क उठा जब *राजस्व आयुक्त ने देवघर सीओ की कार्यशैली पर तीखी टिप्पणी की और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश की।* मगर, विधायक सुरेश पासवान के *रक्षा कवच* के कारण न तो तबादला हुआ, न ही कार्रवाई आगे बढ़ी। अब यह सवाल देवघर की गलियों से लेकर रांची के गलियारों तक गूंज रहा है — सीओ में ऐसी कौन-सी योग्यता है जो आयुक्त की फाइल भी उन पर असर नहीं करती?

वहीं दूसरी तरफ, बीजेपी नेता नारायण दास ने सीएम को टैग कर सीधा वार किया — *देवघर में क्या प्रशासन विधायक के चरणों में है?*

ट्वीट ने जैसे सोई हुई फाइलों में करंट भर दिया। राजस्व विभाग में हलचल मच गई, पर अब तक किसी कुर्सी की टाँगें नहीं हिलीं।

सूत्रों की मानें तो देवघर सीओ डेढ़ साल से उसी कुर्सी से चिपके बैठे हैं, जैसे ये कुर्सी नहीं, संरक्षण की संधि हो। इस बीच कई जिलों के सीओ का तबादला हो चुका, मगर देवघर की फाइल अदृश्य हाथों के नीचे दब गई। आयुक्त की 13 सितंबर की रिपोर्ट अब भी वही धूल खा रही है — शायद उसी टेबल पर जहां जनता की शिकायतें भी दम तोड़ती हैं।

विधायक सुरेश पासवान ने बचाव में कहा — अश्विनी कुमार मेहनती और जनता के बीच लोकप्रिय हैं।
पर विपक्षी खेमे का व्यंग्य सुनिए — अगर मेहनत का मतलब है एक ही जगह वर्षों टिके रहना, तो देवघर सीओ को स्थायी नियुक्ति दे देनी चाहिए।
लोग कह रहे हैं, विकास रुके न रुके, तबादला तो रुक ही गया है।

अब नारायण दास के ट्वीट के बाद मामला मुख्यमंत्री के दरबार में है। जनता का सीधा सवाल है — क्या झारखंड में अब फाइलें नहीं, रिश्ते चलती हैं?
आयुक्त की रिपोर्ट बोल रही है, लेकिन सरकार खामोश है। प्रशासन के गलियारों में कानाफूसी है कि विधायक की ‘विशेष रुचि’ के बिना कोई नोटिंग आगे नहीं बढ़ती।

देवघर की जनता भी अब हंसते-हंसते पूछ रही है —
कहीं ऐसा तो नहीं कि देवघर का तबादला नीति से नहीं, नज़दीकी नीति से चलता है?

सबसे दिलचस्प बात यह कि जब मीडिया ने विधायक सुरेश पासवान से इस मसले पर प्रतिक्रिया लेनी चाही, *तो वे मीडिया से दूरी बनाते नज़र आए।* जैसे अब सवालों से भी विधानसभा क्षेत्र की सीमा तय करनी हो!
लोगों का कहना है — जो कभी जनता की आवाज़ थे, अब कैमरे की नज़र से भी बचते फिर रहे हैं।

देवघर में भूमि विवाद, माप-तौल, और राजस्व मामलों में फाइलें जैसे ‘मौन’ हो गई हैं, पर सियासी शोर बढ़ता जा रहा है। जनता पूछ रही है — क्या देवघर में अब अफसरों का तबादला नहीं, संरक्षण होता है?
आयुक्त की रिपोर्ट की हर लाइन यह चीखती है कि मामला गंभीर है, मगर फाइल की स्याही पर विधायक के स्नेह की मोहर लग चुकी है।

अब निगाहें मुख्यमंत्री पर टिकी हैं — क्या वे इस ‘सियासी मोहजाल’ को काट पाएंगे या फिर देवघर की यह फाइल भी ‘राजनीतिक महक’ के बीच ठंडे बस्ते में सो जाएगी’?
फिलहाल तो देवघर में कहा जा रहा है —
यहां अफसरशाही पर नहीं, सियासत पर भरोसा है; बाकी सब विभागीय भ्रम है।