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आधुनिक बिहार के निर्माता एवं बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री ”बिहार-केसरी ”डा 0 श्रीकृष्ण सिंह जी की पुण्य तिथि 31 जनवरी पर शब्द- सुमनों के भाव-माला से हम अपनी विनम्र श्रद्धा निवेदित करते हैं। (रवींद्र कुमार रतन )

प्रेम रंजन झा का रिपोर्ट

मै तो कभी मिला नहीं,देखा भी नहीं, मगर अपने स्वतंत्रता सेनानी,ताम्रपत्र धारी स्मृति शेष पिता स्व0 विश्वनाथ प्रसाद के मुखारविंद से जो कुछ उनके बारे में सुना था उसी से मै उनको अपने जीवन का प्रेरणा स्रोत बना लिया।
बड़ी खेद और देख की बात है कि बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री, बिहार-केसरी श्रीकृष्ण सिंह का आज के ही निधन हो गया था दिन हुआ था। उन्हे स्मरण करते हुए हम उनकी पुण्य तिथि मनाते हैं और विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।आज बिहार ही नहीं अपितु सभी बर्ग -समुदाय के बुद्धिजीवियों एवं उनसे प्रभावित जनों का सिर गर्व से गौरवान्वित और उँचा हो जाता है।क्योंकि वे स्वार्थ की राजनीति नही की ।जाति-धर्म से उपर उठ कर राष्ट्र की सेवा की जिसके कारण उन्हे महमानव की संज्ञा से विभूषित किया गया तो यह कोई अतिसयोक्ति नही होगी। क्योंकि यह व्यक्ति कभी भीअपने निजी स्वार्थ के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।अपने कर्तव्यों और वसुलों के पक्के हिमायती श्री बाबू अपने विकास के कार्यो और विचारों से लोगों के नाक के बाल बने थे।
लोगों पर श्री बाबू का और श्री बाबू पर लोगों का इतना विश्वास था कि चुनावों में अपनी पार्टी के नेताओं के साथ अपने लिए कभी भी वो
बोट मांगने या चुनाव प्रचार करने नहीं गए। ऐसा कहा जाता है उन्हे विश्वास था कि वे जनता का काम करते हैं ‘,विकास करते हैं तो लोग
उसकी मजदूरी’ बोट ‘ के रुप में जरुर देंगें।
आज हमे याद आरहें हैं इनके साथी ,स्वतंत्रता सेनानी बिहार विधान सभा के प्रथम स्पीकर
स्मृति शेष विन्देश्वरी प्रसाद वर्मा जो लगातार16 वर्षों तक बिहार विधान सभाके स्पीकर रहे। इन दोनों का बिहार के विकास में अतुलनीय, अद्वितीय और अविस्मर्णीय योग दान रहा ।अजादी काअमृतमहोत्सव मनाया गया ,क्या प्रथम मुख्य मंत्री और प्रथम स्पीकर होने के नाते वह सम्मान या चर्चा हुआ जो होना चाहिए था या मिलना चाहिए था ।बिहार के विकास मे इन लोगों ने अपनी महती भूमिका निभाते हुए, जाति-धर्म से उपर उठ कर बिहार को गौरव गरिमा प्रदान करने , उपर उठाने में क्या कोई कसर छोड़ा नहीं तोफिर जिसने देश की आजादी के लिए लड़ा। किसी जात, समाज के लिए तो नही लड़ा फ़िर तो दुख इस बात से होती है कि ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, युग पुरुषों को जो सागर के स्वरुप रुपी स्वभाव का स्वामी रहा है उसकी जयंती मनाने के लिए,पुण्य तिथि मनाने के लिए जात,समाज को सामने आने की जरुरत क्यों पड़ती है ? बोट की राजनीति के प्रभाव के कारण इन राष्ट्रीय छवि बाले महामानवों को जो स्वयं में सागर था।ऊन्हे जात और समाज के लोग ,सागर को लोटा मे भर इनकी राष्ट्रीय छवि को धूमिल करते हैं उनके विराट रुप को बौना बनाने का दुस्प्रयास क्यों करते हैं? क्या ये लोग जात -समाज या धर्म के लिए अपनी जवानी की आहुति दी थी? देश की आजादी के लिए लड़ने बालो को सभी की श्रद्धांजलि मिलनी चाहिए ।उनका आदर और सत्कार करने का मतलब
आप भारत माता का प्यार करते हैं
आज हम भारतीय निर्वल आत्माओं के पास हैं ही क्या जो दें।बस आपके प्रति सच्ची
श्रद्धांजलि यही होगी कि आपके सपनो का बिहार बने।भारत रुपी उपवन मे सभी पुष्पों को खिलने का अधिकार हैं सबको मुस्काने का मौका मिले । अगर उनके बताए रास्ते पर हम चलें और अपने प्रतिनिधियों को भी चलने को प्रेरित करें तो यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हम अपने शब्द सुमनो से बने माला चढा कर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं।
शत शत नमन कोटि कोटि प्रणाम।जय बिहार,जय भारत
जय स्वतंत्रता सेनानी तुम बार बार इस धरती पर आओ और हमारा नेतृत्व कर नया बिहार ‘, नया भारत बनाओ।