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संत माइकल एंग्लो विद्यालय में मनोवैज्ञानिक तौर से पढ़ाई में रूचि बढ़ाने के लिए वर्क शॉप का किया जा रहा है आयोजन

 

बच्चों के मन में पढाई के प्रति रूचि पैदा करने के लिए चलाए जा रहे हैं मुहीम

पढ़ाई के प्रति रूचि पैदा कर उसे ब्रिलियेंट बच्चों के समकक्ष तैयार करने की चला रहे हैं मुहिम

 

देवघर से प्रेम रंजन झा

शिक्षा के प्रति समर्पण ही एक अध्यापक का धर्म है।
एक अध्यापक को समाज ने अधिकार दिया है कि वह अपने छात्र के जीवन में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हस्तक्षेप करे, विद्यार्थियों को भविष्य के सपने दिखाए और उनमें निहित क्षमता को समृद्ध कर उन सपनों को साकार करने के लिए तैयार करे। ऐसा करते हुए एक शिक्षक बच्चों में मूल्यों और मनोवृत्तियों को भी गढ़ता है। बच्चे देश के कर्णधार हैं, तो शिक्षक की भूमिका द्रोणाचार्य के रूप में कही जा सकती है। लेकिन आज माहौल में काफी तब्दीली आ गई, आज गुरु के इस गुरूत्तर दायित्व को निभाने वाले शिक्षक विरले ही दिखाई पड़ते हैं। संत माइकल एंग्लो ग्रुप के चेयरमैन डॉ. जे.सी.राज इन विरले शिक्षकों में से एक हैं जो देश के कर्णधारों का भविष्य तैयार करने के मिशन में जुटे हैं। डॉ. जे.सी.राज आजकल वैसे बच्चे जो पढ़ने में तेज नहीं है उनके मन में न सिर्फ पढ़ने के प्रति रूचि पैदा करने में बल्कि मानसिक रूप से तेज कर उसे ब्रिलियेंट बच्चों के समकक्ष तैयार करने की मुहिम चला रहे हैं। डॉ. जे.सी.राज ने बताया कि आजकल संत माइकल एंग्लो विद्यालय के दोनों शाखाओं में
मनोवैज्ञानिक तौर से पढ़ाई में रूचि बढ़ाने के लिए वर्क शॉप का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें वैसे बच्चों जो पढ़ाई में रूचि नहीं रखते, जिनसे घर में उसके गार्जियन परेशान रहते हैं ऐसे बच्चे वर्कशाप में भाग ले रहे हैं। वर्कशॉप में शिक्षक क्लास में अपने प्रजेंटेशन द्वारा बच्चों में भिजुअलाइज करवा देते जो वो पढ़ाना चाहते हैं। इसके अलावे बच्चों को पढ़ाई के क्रम यह बतलाया जाता है कि पुस्तक ही सर्वोपरि है।मोबाइल, टीवी, लैपटाप और गुगल छोडकर किताब से पढने की सलाह दिया जाता है। इसके अलावे थोड़ा मेडिटेशन और सुपर ब्रेन योगा के द्वारा भी पढ़ाई में फोकस करने की सीख दी जाती है ताकि जो चीज पढ़ाई जाती है वह पिक्चर के रूप में ब्रेन में स्थापित हो जाए।

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